रफ़्तार जिंदगी और जूनून की -कुणाल फडणीस


You can take a man out of a game but you cannot take the game out of a man’s life. आप किसी व्यक्ति को खेल से बाहर कर सकते हैं, मगर खेल को उसकी जिंदगी से बाहर करना आसान नहीं| कोई भी एथलीट केवल मेडल हासिल करने के लिए ही नहीं दौड़ता, मंज़िलों से लगी शर्तों को पूरा करना और समय की रफ़्तार से रेस लगाना शायद उसका  जूनून होता है| “एन.वाय.सी.एस गेल रफ़्तार इंडियन स्पीडस्टार सीज़न टू” अपनी फायनल्स की ओर पहुँचने ही को है और दोनों ही सीज़न्स की प्रतियोगिताओं में हमने अनन्य साधारण प्रतिभाएँ देखीं हैं, जूनून की अद्भुत सी कहानियाँ सुनीं हैं और खेल के साथ साथ सभी में पनपती खेल भावना – “sportsman spirit” का भी अनुभव किया है| मगर आज ये कहानी गेल रफ़्तार इंडियन स्पीडस्टार के किसी बच्चे की नहीं बल्कि उन सभी बच्चों के लिए मेहनत करने वाले, उन्हें प्रोत्साहित करने वाले, उनके प्रदर्शन की सही जाँच और विश्लेषण करने वाले हमारे डिस्ट्रिक्ट और स्टेट रिप्रेजेंटेटिव्स में से एक गुजरात राज्य के स्टेट रिप्रेजेंटेटिव कुणाल फडणीस की है|

पीछले सीज़न में भी कुणाल ने पूरी लगन से गेल रफ़्तार में अपनी सारी रफ़्तार लगा दी| क्योंकि शायद रफ़्तार ही इनकी जिंदगी है| बचपन से ही खेलकूद में रुची रखने वाले कुणाल खुद एक एथलीट रह चुके हैं| खो खो, फूटबॉल, रॉक क्लायंबिंग इन सभी खेलों में उन्होंने मेडल जीते मगर १०० मीटर स्प्रिन्टिंग में जीता हुआ गोल्ड मेडल इनका सबसे यादगार मेडल है| जहाँ दूर तक फैली जमीन देखी, तो लगे दौड़ने| रनिंग इनका जूनून और खेल ही इनकी नब्ज़| मगर जिंदगी की रफ़्तार हम सभी से हमेशा ज्यादा होती है, मानो शर्त लगा रही हो हमसे जीत जाने की| कुछ ऐसी ही कोशिश जिंदगी ने की - कुणाल के साथ भी|

दिन था सोलह दिसंबर, साल दो हज़ार| सतरह वर्षीय कुणाल कॉलेज की छुट्टीयों में आणंद से बडोदा अपने घर जा रहे थे| ट्रेन स्टेशन से निकल रही थी और भीड़ और हुजूम तो पूछो मत| उनका दोस्त भी उनके साथ था| वो तो जैसे तैसे अंदर घुस गया मगर पाँव फिसल कर गिरने की वजह से कुणाल ट्रेन पर चढ़ न सके और चलती ट्रेन और प्लेटफोर्म के बीच घिसते चले गए| अगर ट्रेन में खडे लोगों ने उन्हें पकड़ न लिया होता तो शायद जिंदगी नहीं मौत जीत जाती| प्लेटफोर्म ख्त्म होते ही पकड़ा हुआ हाथ छुटकर कुणाल जमीन पर गिर पड़े| लोग दौड़े दौड़े उन्हें देखने आए तो सही मगर भीड़ में से किसी का हाथ कुणाल को थामने आगे नहीं आया| उनका दोस्त भी अब तक ट्रेन से उतरकर उनके पास पहुँच चूका था| मदद ढूंढने इधर उधर दौड़ने वाले उनके दोस्त ने स्टेशन से बाहर खड़े रिक्शा ड्रायवरों को गुहार लगाई तो चार पाँच रिक्शावाले आगे बढकर कुणाल को उठाकर अस्पताल ले गए| कुणाल की हालत बहुत बुरी थी | खून रुकने का नाम नहीं ले रहा था और पैर कुछ भी महसूस करने की शक्ती खो चुके थे| आणंद के जनरल अस्पताल के डॉक्टरों ने एम्ब्युलेंस की  व्यवस्था करते हुए उन्हें बडोदा भेजने का निर्णय लिया| शायद आगे का कठीन समय उन्होंने पहले ही भाँप लिया था और कुणाल का परिवार के पास होना ही उन्हें ज्यादा जायज लगा|

आणंद से एम्ब्युलेंस बड़ोदा की तरफ निकल पड़ी| घर और कॉलेज पर खबर पहुँच चुकी थी| बेटे की रेल दुर्घटना की खबर सुनकर माँ बाप काँप उठे थे| एम्ब्युलेंस से आने वाला बेटा क्या आँखें खोलकर उनको देख सकेगा? संदेह और चिंता से घरवालों की साँसें रुकी हुईं थी और इधर घायल अवस्था में भी कुणाल सचेत रहने की कोशिश में अपने दोस्त से लगातार बातें कर रहे थे| शायद पैरों ने अपनी ताकत खो दी थी मगर दिल ने अभी हौसला नहीं खोया था|

अब तक जैसे तैसे आँखे खुली रखने वाले कुणाल ने घरवालों को देखकर चैन की साँस ली और अपने आप को उन्हें सोंप दिया| भाईलाल अमीन अस्पताल में कई घंटो तक ऑपरेशन चला| डॉक्टर्स भी अपनी सारी कोशिशों की हदें आजमा रहे थे| मगर बेहद तो तकदीर की बेरहमी भी थी| ऑपरेशन के बाद जब बेहोशी का असर उतरा तो दर्द के एहसास से भी आगे बढ़कर एक कड़वा सच उनके सामने आया| ऑपरेशन के दौरान उनके दोनों पैर घुटने से नीचे से काटने पड़े थे| डॉक्टरों ने जब छह महीनों तक बिस्तर में रहने की बात की तो अब ये भी नहीं कहा जा सकता था कि पैरों तले जमीं खिसक गई|

सप्ताह भर कुणाल बहुत उदास रहे| किसी रनर के लिए पैर खोना जिंदगी खोने से कम नहीं| कुणाल की केस अब ऐम्प्युटी विशेषज्ञ डॉ. वीरेंद्र शांडिल्य के पास पहुँची| पहले ऑपरेशन के हफ्ते भर बाद ही जब कि ज़ख्म अभी भरे भी नहीं थे, कुणाल के लिए प्लास्टर ऑफ पैरीस के बनावटी पैर बनाए गए| उन नकली पैरों को घुटनों पर लगाने से पहले वाला ज़ख्म रिसता रहता और खून बहता रहता| उस एक एक्सीडेंट की परछाई पूरी जिंदगी पर पड गई थी| ऐसे में डॉ. शांडिल्य कुणाल से मिलने राजू को ले आए| राजू भी एक ऐम्प्युटी था, और उसे सामान्य रुप से चलता फिरता देखकर, कुणाल का ढाढस बंधा| एक उम्मीद की लौ जलने लगी और अस्पताल की खिडकी में से दिखने वाले से बाहर वाले लॉन पर कदम रखने को कुणाल का दिल करने लगा| अपने पैरों पर खड़े होने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार थे| कुणाल ने महीने भर में चलते हुए घर जाने की ठानी और उस दिशा में मेहनत करने में जुट गए| पैरोंको हल्के से हिलाना, फिर धीरे धीरे शरीर को उठाते हुए पैर बिस्तर से नीचे लेना, खड़े होने की कोशिश करना और एक एक कदम चलने का प्रयास करना, ये सब बहुत पीड़ादायक और मुश्किल था| एक छोटे बच्चे की भाँती कुणाल फिर से चलना सीख रहे थे| मगर उस सीख में विश्वास था| सफल होने की चुनौती थी| ठीक डेढ़ महीने बाद २१ जनवरी को कुणाल अपने कृत्रिम पैरों के सहारे घर पहुँचे| माँ बाप ने बहुत धीरज रखते हुए उन्हें सिर्फ घर में ही नहीं बाहर सडक और मैदान में चलने को प्रेरीत किया| वो अपने बेटे को जिंदगी की राह पर सीना तान कर चलते हुए देखना चाहते थे| कुणाल ने भी अपना लक्ष्य तय कर लिया था| मात्र छह महीनों में वह चलने फिरने और गाड़ी भी चलाने लग गए थे|

उसके “गैट पैटर्न” को देख कर डॉ. शांडिल्य का विश्वास भी बढ़ने लगा| वक्त के साथ साथ प्लास्टर ऑफ पैरीस के पैरों की जगह उन्नत प्रोस्थेसिस(आर्टिफिशियल लिम्बस्) ने ले ली जिसके सहारे कुणाल सारी शारीरिक गतिविधियाँ बखूबी करने लगे थे| अब डॉ. शांडिल्य कुणाल को फिटनेस की ओर प्रोत्साहित करने लगे| जो शायद सोच कर भी हम सिहर जाएँ, मगर कुणाल ने डॉक्टर की सलाह पर डांस क्लासेस में प्रवेश लिया ताकी पैरों का संचलन सुधार सकें| आगे बारह वर्षों तक हिपहॉप, बोलीवुड, और लोकनृत्य जैसी शैलियाँ वो सीखते रहे| धीरे धीरे जिम्नेस्टिक भी करने लगे| फिर रनिंग का शौक बचपन से ही रखने वाले कुणाल ने फिर दौड़ने की सोची| २००८ में हुई पहली बड़ोदा मैरथन में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदीजी के साथ मैरथन ध्वज लहराकर उन्होंने ३ किलोमीटर की दौड लगाई| फिर हौसला बढ़ता रहा और धीरे धीरे पाँच और अब दस किलोमीटर की मैरथन कुणाल आराम से पूरी कर लेते हैं | वह एक ऐम्प्युटी मैरथन ग्रुप के सदस्य हैं और देश भर में अपने इन दोस्तों के साथ उन्होंने कई मैरथन्स पूरी की हैं| कुणाल कि ये मिसाल किसी करिश्मे से कम नहीं|

साल २००२ में “ऐम्प्युटी असोसिएशन ऑफ इंडिया” की स्थापना करते हुए कुणाल और उनके परिवार ने दूसरे ऐम्प्युटीज् को भी मदद दिलाने का कार्य जारी किया| यह असोसिएशन आज तक करीबन अस्सी से नब्बे ऐम्प्युटीज् को प्रोस्थेसिस दिला चुकी हैं| कुणाल ने इस सबके बीच, बी.एस्सी के साथ साथ मैकेनिकल इंजीनियरिंग भी पूरी की है और कोक गिल्श इंटरनेशनल में वह प्रोजेक्ट मैनेजर के रुप में काम करते हैं| अगर बताया ना जाए तो कोई कह ही नही सकता कि कुणाल अपने असली पैरों पर नहीं चलते|

सफ़र आसान तो नहीं था| दौड़ लगाने की कोशिश करते हुए रिश्ते ज़ख्मों ने हौसले को टूटने नहीं दिया| दर्द की कोई लहर ने मुख की मुस्कान पर हावी नहीं हुई| शायद कोई और होता तो अपने भाग्य को कोसता मगर कुणाल महज छह महीनों में न केवल अपने पैरों पर खड़े रहे बल्कि छह महीनों में अपनी स्कूटर भी चलाने लग गए| डॉ. शांडिल्य के साथ कुणाल उनके सेमिनार्स में जाकर अपने अनुभव का कथन करते हैं ताकि शायद कोई और उनसे प्रेरित होकर अपनी जिंदगी में वही रफ़्तार और जूनून ले आ सकें| जिंदगी हमेशा ही नहीं जीतती, कभी कभी कुणाल जैसे “स्पोर्ट्समन” अपनी जिद से जिंदगी से भी जीत जाते हैं|

गेल रफ़्तार के कार्यक्रम में घंटों मैदान में बच्चों के साथ चलने दौड़ने वाला हमारा यह स्टेट रिप्रेजेंटेटिव, साहस, दृढता, हिम्मत और जीत की एक अनोखी मिसाल है| एन.वाय.सी.एस को अपने इस साथी और सेनानी पर गर्व है| मन के हारे हार है और मन के जीते जीत ये सिखाने वाले इस जादूगर के साथ शायद हमारे बच्चे भी कोई करिश्मा कर दें और देश के लिए ट्रैक और फिल्ड इव्हेंट्स में हमारा नाम रौशन कर दें| कुणाल की जिंदादिली को सलाम, उनके जिंदगी जीने के जज़्बे को सलाम|